" संसार में स्वास्थ्य से बढकर कुछ भी नहीं. कहा भी गया है - 'प्रथम सुख निरोगी काया '. जब हम शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे तभी संसार के किसी भी सुख का आनन्द ले सकेंगे और इसके लिए आवश्यक है अपने स्वाथ्य की रक्षा करना, और फिर बीमार पड़कर इलाज कराने से बेहतर यही है की बीमार पड़ने से बचने के प्रयास किये जाये. इस ब्लॉग में स्वास्थ्य सम्बन्धी विभिन्न विषयों पर बहुमूल्य जानकारी दी गई है जो आपके स्वास्थ्य की देखभाल करने में काफी मददगार साबित होगी." " सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:"
Saturday, May 5, 2012
Sunday, September 18, 2011
आश्चर्यजनक ह्रदय...
Monday, August 29, 2011
रक्त में ऐसे बढ़ाएं RBC यानि लाल रक्त कोशिकाएं.
Sunday, August 31, 2008
विलक्षणताओं से भरा मानव शरीर
हमारे शरीर का ५० प्रतिशत भाग मांसपेशियों के रूप में है।प्रत्येक मांसपेशी अनेक तन्तुओं से मिलकर बनी है.ये तंतु बाल के समान पतले होते हैं पर मजबूत इतने की अपने वजन की तुलना में एक लाख गुना वजन उठा सकें.
औसतन मनुष्य के सिर में १२०००० बाल होते हैं।बालों की वृद्धि प्रतिमास तीन चौथाई इंच होती है.किसी के बाल तेजी से तो किसी के धीमी गति से बढ़ते हैं.
मनुष्य के बालों की आयु १।५ वर्ष से लेकर ६ वर्ष तक होती है. आयु पूरी करके बाल अपनी जड़ से टूट जाता है और उसके स्थान पर नया बाल उगता है.
हमारी एक वर्ग त्वचा में प्रायः ७२ फुट लम्बी तंत्रिकाओं का जाल बिछा होता है।इतनी ही जगह में रक्त नलिकाओं की लम्बाई नापी जाए तो वे भी १२ फुट से कम नहीं होंगी.
हमारे गुर्दे में १० लाख से भी अधिक नलिकाएं होती है।इन सबको एक लम्बी कतार में रखा जाए तो ११० किलोमीटर लम्बी डोरी बन जायेगी.
चमडी की सतह पर प्रायः दो लाख स्वेद ग्रन्थियां होती है,जिनमें से पसीने के रूप में हानिकारक पदार्थ बहार निकलते रहते है।पसीना दिखता तो तब है,जब वह बूंदों के रूप में बाहर आता है,लेकिन वह धीरे-धीरे हमेशा ही रिसते रहता है.
मनुष्य की दाढ़ी में औसतन ७५०० से १५००० बाल होते हैं तथा भौहों में लगभग ५५० बाल होते हैं।
एक वर्ष में हम एक करोड़ (१० मिलियन) बार साँस लेते है।
हमारे शरीर की सबसे कठोर हड्डी जबड़े की तथा मजबूत मांसपेशी जीभ की मानी जाती है।
हमारे गुर्दे एक घंटे में इतना रक्त छानते है,जिसका वजन शरीर के भार से दुगुना होता है.
चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: शरीर, बाल, त्वचा, गुर्दा, पसीना, रक्त, जीभ, दाढ़ी,
Sunday, July 27, 2008
क्यों चटकती है हड्डियाँ?
दरअसल हड्डियों के जोड़ों के चटकने के दो अलग-अलग कारण हैं.जब उँगलियाँ चटकाई जाती है,तब वे लगभग अपनी सीमा तक मोड़ दी जाती है.उँगलियों के जोड़ के आसपास द्रव पदार्थ भरा होता है,जिसमें वायु मिश्रित होती है.जब हम जाने-अनजाने में उँगलियाँ चटकाते हैं तो यह वायु बुलबुलों के रूप में द्रव पदार्थ से अलग होती है.इन्ही बुलबुलों के कारण आवाज पैदा होती है,जिसे हम उँगलियाँ चटकना कहते हैं.जब तक यह वायु दोबारा द्रव पदार्थ में घुलमिल नहीं जाती ,तब तक फ़िर से उँगलियाँ चटकाने पर यह आवाज नहीं आ सकती.
दूसरी ओर शरीर को ऐंठने,मोड़ने या अंगडाई लेने से हड्डियों के चटकने की आवाज आती है उसका कारण वे ऊतक हैं.जो मांसपेशियों ओर हड्डियों के बीच में रहते हैं.जब इन पर तनाव पड़ता है तो ये अपने स्थान से हट जाते हैं और इसी कारण से आवाज पैदा होती है,जिसे हम हड्डियाँ चटकना कहते हैं.इसकी पुनरावृत्ति का कोई निशिचत समय नहीं होता है.अर्थात कुछ लोगों में यह उसी समय दोबारा भी हो सकता है.कुछ के साथ नहीं भी हो सकता.
Sunday, July 20, 2008
कोई अंग सुन्न क्यों हो जाता है?
शरीर का कोई अंग यदि किसी दबाव में ज्यादा समय तक रहता है,तो वह सुन्न हो जाता है.वस्तुतः यह दबाव हाथ या पैर की नसों पर पड़ता है, ये नसें कई एक कोशीय फाइबर से बनी होती है. प्रत्येक एक कोशीय फाइबर अलग-अलग संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य करता है.इन फाइबरों की मोटाई भी कम-ज्यादा होती है.इसका कारण माइलिन नामक श्वेत रंग के पदार्थ द्वारा बनाई गई झिल्ली है.इन पर दबाव पड़ने से मस्तिस्क तक नसों द्वारा पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन और रक्त का संचरण नहीं हो पता है. मस्तिष्क तक उस अंग के बारे में पहुंचने वाली जानकारी रक्त और आक्सीजन के अभाव में अवरूद्ध हो जाती है.इस कारण वहां संवेदना महसूस नहीं हो पाती और वह अंग सुन्न हो जाता है.
जब उस अंग पर से दबाव हट जाता है तब रक्त और आक्सीजन का संचरण नियमित हो जाता है और पुनः उस अंग में संवेदनशीलता लौट आती है.
चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: हाथ, पैर, सुन्न, शरीर, अंग, नस, कोश(cell), मस्तिष्क, फाइबर, आक्सीजन(oxizen), रक्त, संवेदना, माइलिन,
Thursday, May 8, 2008
कैसा हो गर्मियों में आपका आहार ?
विशेष रूप से ग्रीष्म ऋतु में आहार-विहार पर खास ध्यान देना चाहिए।बिना आहार-विहार का ध्यान रखे ग्रीष्म ऋतु का सही आनंद नहीं उठाया जा सकता, क्योंकि आहार-विहार के असंतुलन से व्याधि ग्रस्त होने की आशंकाएं बढ़ जाती है.इसलिए गर्मियों में इन बातों का खासतौर से ध्यान रखें:-
- गर्मियों में इस बात का सदैव ध्यान रखें की आपके शरीर में पानी की कमी न होने पाएं,इसके लिए थोड़े-थोड़े अंतराल पर शीतल जल अवश्य ग्रहण करें।दिन भर में १०-१२ गिलास पानी जरूर पीना चाहिए.
- आहार में सुपाच्य,ताजे ,हल्के,रसीले और सादे पदार्थों का ही सेवन करना चाहिए।तले हुए,खट्टे,तेज मिर्च व मसालेदार,भारी और गर्म प्रकृति के पदार्थों का सेवन यदा-कदा और कम मात्रा मे ही करना चाहिए. यदिइनका सेवन न करें तो और भी अच्छा रहेगा।
- इस ऋतु में भूख सहन करना यानि देर से भोजन करना शरीर में दुर्बलता और कमजोरी लाने वाला होता है,इसलिए निश्चित समय पर अच्छी तरह चबा-चबाकर ही भोजन करना चहिये।
- गर्मी के मौसमी फलों जैसे तरबूज,खरबूजा,खीरा,ककडी,फालसा,संतरा,अंगूर तथा लीची आदि का सेवन अवश्यकरें,ये फल शरीर को तरावट और शीतलता पहुँचाने में मददगार होंगे।
- नींबू की मीठी सिकंजी,कच्चे आम का पना,दूध-पानी की मीठी लस्सी,पतला सत्तू,फलों का जूस,ग्लूकोज तथाशरबत तरावट के लिए जरूर पियें।बेल का शरबत तथा ठंडाई आदि के सेवन से भी गर्मी में राहत मिलती है.
- सेहत की दृष्टि से सेब,बेल और आवले का मुरब्बा,गुलकंद,आगरे का पेठा खाना लाभप्रद सिद्ध होता है।
- घर में पुदीन हरा,ग्लूकोज,इलेक्ट्रोल आदि जरूर रखे।दस्त आदि की दवाएं तथा फर्स्ट एड बॉक्स रखना भीजरूरी है.
- इस ऋतु में लोग सुबह देर तक सोये रहना पसंद करते है,जो शरीर,स्वास्थ्य और चेहरे की सुन्दरता खास करके आंखों के लिए बहुत हानिकारक होता है,इसलिए सुबह देर तक सोये रहना और देर रात तक जागना कदापि उचित नहीं.
Tuesday, April 29, 2008
ऐसे पाएं गर्मी से निजात
भले ही गर्मी अपने चरमोत्कर्ष पर है,पर ऐसे में घर पर भी तो बैठा नहीं जा सकता।नौकरी,कैरिअर, सामाजिकसम्पर्क आदि कायम रखने बाहर तो निकलना ही पड़ता है। गर्मी से सुरक्षित रहते हुए बाहर आने-जाने के बारे में सुझाव प्रस्तुत है:-
- गर्मी के रोगों से बचने के लिए प्रतिदिन सुबह मुंह धोने के बाद एक गिलास नींबू पानी पी लें।चेहरेकी चमक बनी रहे इसके लिए दिन भर में १०-१५ गिलास पानी जरुर पियें.शरीर में पानी की कमी बिल्कुल न होने दें.
- इस ऋतु के फल शरीर के लिए वरदान हैं।दूध,आम व सेब का रस अतिरिक्त लाभ पहुँचाता है.जलजिरा,कच्चे आम का पना व रस,प्याज,मट्ठा व दही शीतलता देने के साथ-साथ लू से भी बचाते हैं.
- नशीले पदार्थ गर्मी को और अधिक बढाते हैं।सिगरेट,शराब,चाय,काफी,मसालेदार तली-भुनी चीजों की जगह हरी सब्जियां व फलों पर अधिक ध्यान दें.
- सप्ताह में एक बार मालिश अवश्य करें।जैतून या नारियल के तेल का प्रयोग करें,इससे शरीर लचीला व कोमल बना रहेगा.सुबह जल्दी ही ठंडे पानी से नहाये और शाम को भी नहाये,इससे शरीर में चुस्ती बनी रहेगी.
- गहरा मेकअप इन दिनों बिल्कुल न करें।एक तो पसीने से यह आपके सौंदर्य को बढ़ाने की अपेक्षाकम कर देगा,दूसरा इससे गर्मी अधिक लगेगी.बिल्कुल हल्का मेकअप सौंदर्य को निखारेगा.
- ठंड से गरम व गरम से एकदम ठंडे वातावरण मे न जायें,इससे लू लगने की सम्भावना बढ़ जाती है।बाहर निकलते समय शरीर को ढककर निकलें व नंगे पैर बिल्कुल न निकलें.
- सूरज की तेज रोशनी सीधे आंखों को प्रभावित करती है.आंखों के बचाव के लिए जब भी धुप में निकलें चश्मा अवश्य लगाएं.
Sunday, April 27, 2008
औषधीय गुणों से भरपूर है बर्फ
प्रस्तुत है बर्फ के द्वारा घरेलू उपचार करने के कुछ तरीके:-
- शरीर के किसी भाग से खून बह रहा हो तो उस स्थान पर बर्फ लगाने से खून आना बंद हो जाता है।
- हाथ या पैर में मोच आ गई हो तो बर्फ का टुकडा १० मिनट तक रगड़ने से सूजन नहीं आती।
- लू लगने की स्थिति में बर्फ के टुकड़े हाथ-पैरों पर मलने से काफी आराम मिलता है।
- अधिक गर्मी की वजह से कई बार नाक से खून बहने लगता है,इसके लिए बर्फ का छोटा टुकडासूंघने से खून आना बंद हो जाता है।
- प्रतिदिन चेहरे पर बर्फ रगड़ने से झुर्रियां नहीं पडती और चेहरा खिला-खिला रहता है।
- गर्मी के मौसम में अधिक खा लेने पर आइसक्रीम या बर्फ खा ली जाय तो खाना जल्दी पच जाता है।
- तेज बुखार होने पर माथे पर बर्फ के पानी की पट्टी रखने से और शरीर पर बर्फ मलने से बुखार शीघ्रउतरने लगता है।
- भूख न लग रही हो तो खाना खाने के आधा घंटा पहले बर्फ का पानी पियें,इससे भूख बढ़ती है।
- पेट में जलन,उलटी,दस्त आदि में बर्फ का पानी पीने या पेट पर बर्फ रगड़ने से जलन आदि में राहत मिलती है.
Saturday, April 26, 2008
...और थकान हो जाए छू मंतर
थकान पर विजय कैसे?
यदि कार्य को सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित ढंग से किया जाए,तो अनावश्यक तनाव एवं थकान से बचा जा सकता है।रूचिकर कार्य करने से भी थकान महसूस नही होती और एक साथ देर तक कार्य किया जा सकता है.अतः थकान से बचने के लिए कार्य में रुचि का समावेश आवश्यक है.
अल्पकालीन विश्राम के अलावा पूर्ण विश्राम का अचूक उपाय है नींद,जो थके-हरे व्यक्ति के लिए टॉनिक का काम करती है।कम नींद लेने से सुस्ती आती है,जो आपको चिडचिडा बना देती है व काम में मन नही लगता है.
शरीर में स्फूर्ति लाने व मन को प्रशन्न करने के लिए खुली जगह में व्यायाम करें ताकि शुद्ध हवा व खुले प्राकृतिक वातावरण से आलस्य व थकान दूर हो।ऐसा करने से रक्त में 'अंदाफिंस' की मात्रा बढ़ती है.
थकान दूर करने के लिए आवश्यक है आप तनावमुक्त रहें,चूकि तनाव जहाँ दिमाग को कमजोर करता है,वहीं शरीर की शक्ति को घटाकर थकावट पैदा करता है।
कार्य की एकरसता भी थकान का कारण बनती है।ऐसे में कार्य में परिवर्तन करने से थकान दूर हो जाती है.
भोजन में फल व हरी सब्जियां अधिक मात्रा में लें।मांस,अंडे व अल्कोहल का सेवन न करें.यथासंभव विटामिन'बी',मैग्नीशियम,पोटेशियम और लौह खनिज युक्त भोजन करें.
आहार नियत समय पर उचित मात्रा में ही लें अन्यथा पाचन तन्त्र पर बोझ डालने से वह थकन को बढाता ही है।
थकान को मामूली समझकर नजर अंदाज न करें क्योंकि प्रायः आराम और नींद के बाद भी तन-मन में हल्कापन वताजगी यदि आप महसूस नहीं कर रहें हैं तो सतर्क हो जाइये,क्योकि यह किसी रोग जैसे अनीमिया,थैरोइड ,मधुमेह,टी.बी. या अन्य किसी गम्भीर रोग के लक्षण हो सकते है.
Tuesday, March 25, 2008
" ह्रदय रोगों का कसता शिकंजा "
वर्तमान आक्रामक प्रतिस्पर्धात्मक जीवन पद्धति ने भौतिक सुख-सुविधाओं में अतिशय वृद्धि की है,परन्तु साथ ही मनुष्य की मानसिक-शान्ति एवम शारीरिक-स्वास्थ्य को भी बुरी तरह नष्ट कर दिया है।ह्रदय रोगों की बढ़ती संख्या इसी की देन है.नवीनतम वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व जनसंख्या की लगभग २५%आबादी इसकी चपेट मे है.सामान्य रूप से संकट के समय परिस्थिति से निपटने के लिए प्रकृति स्वयं ही हमारा रक्तचाप बढा देती है,और यह बढा हुआ रक्तचाप स्थिति सामान्य हो जाने पर स्वतः ही सामान्य हो जाता है.परन्तु वर्तमान में क्रोध,भय,तनाव,चिंता व अश्न्तुष्टि के जाल मे उलझे-फसें व्यक्ति में संकट से लड़ने की क्षमता ही समाप्त होती जा रही है और इसके फलस्वरूप ह्रदय रोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है.
कृत्रिम-अप्राकृतिक जीवन शैली,असयमित खान-पान और आहार-विहार से रक्त मे विकार बढ़ते चले जा रहे हैं।निजी,घरेलुऔर कार्यक्षेत्र की समस्याओं से मन-मस्तिस्क मे यदि चिंता व तनाव बना रहता है तो इससे भी रक्त मे विकार उत्पन्न होते रहते है.विकारयुक्त रक्त से धमनियाँ संकरी व कड़ी हो जाती हैं और रक्त-संचरण मे अवरोध आता है.ब्लड-प्रेशर का रोग शरीर की दूषित अवस्था से आरम्भ होता है और कभी-कभी यह इतना गंभीर रूप ले लेता है की रोगी के लिए जानलेवा सिद्ध होता है.
उच्च रक्तचाप के अनेक कारणों मे शरीर में नमक की अधिकता एक मुख्य कारण है।जब लगे की रक्तचाप सामान्य से बढ़ रहा है ,तो समझना चाहिए की शरीर जरूरत से ज्यादा नमक ग्रहण कर रहा है.कभी-कभी यह बीमारी आनुवांशिक भी होता है.इसके अलावा गुर्दे की खराबी,शरीर में हार्मोन असंतुलन,लम्बे समय तक गर्भ-निरोधक गोलियों का सेवन,गर्भावस्था,परिस्थितियों का तनाव,विपरीत मनोदशा और आवश्यक आराम का अभाव आदि ऐसे अनेक कारण हो सकते हैं जो ह्रदय रोगों तथा उच्च रक्तचाप को जन्म देते हैं.चाय काफी और नशीले पदार्थों का अधिक सेवन भी रक्तचाप को बढ़ता है.मोटापा भी उच्च रक्तचाप का एक बहुत बडा कारण है.
उच्च रक्तचाप से व्यक्ति को सिर दर्द,चक्कर आना,,तनाव,मुंह लाल होना,धमनियों मे रूकावट,साँस फूलना तथा दिमाग की नस फटना,आंखों का कमजोर होना,किडनी पर दुस्प्रभाव जैसे घातक लक्षण प्रकट होते हैं।उच्च रक्तचाप से ह्रदय की मांसपेशियों में स्थायी रूप से दोष पैदा हो जाते हैं जिससे पम्पिंग क्रिया प्रभावित होकर 'हार्ट अटैक' हो सकता है.
उच्च रक्तचाप न हो इसके लिए सबसे जरूरी है खानपान और आहार-विहार में संयम।,प्रात काल उठकर टहलना,थोडी देर व्यायाम-आसन करना भी इसके लिए अत्यन्त लाभदायक है.उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों को नमक रहित संतुलित आहार लेना चाहिए.चिकने व प्रोटीन युक्त पदार्थों का सेवन कम करना चाहिए.चाय,काफी और नशीले पदार्थों का सेवन पूरी तरह बंद करना ही हितकर है.
इसके अतिरिक्त चिंता,तनाव,ईर्ष्या,द्वेष,झूठ आदि मनोविकारों से बचने का प्रयास करना चाहिए.सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है की अपनी कमजोरियों से हम बीमारियों को स्वयं आमंत्रित करते है.अनियमित जीवन शैली ने ही हमें बीमारियों से घेर रखा है. यदि हम पुनः प्रकृति के अनुशासन मे रहकर जीना सिख सकें,तो स्वस्थ रहना कोई असम्भव कार्य नहीं है.